दलहनी फसलें

दलहनी फसलें (Pulses crops)

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लेग्युम (Legume) कुल की फसलों को दलहनी फसलें कहा जाता है। यह फसलें खनिज तत्वों से भरपूर होती है तथा इन्हें किसी भी मौसम (खरीफ ऋतु, रबी ऋतु, जायद ऋतु) में उगाया जा सकता है।

  • खरीफ ऋतु में – अरहर, उर्द, मूंग, लोबिया मोथ, सोयाबीन आदि।
  • रबी ऋतु में – चना, मटर, मंसूर, खेसारी आदि।
  • जायद ऋतु में – मूंग, उर्द, लोबिया, सोयाबीन आदि।

2 नवम्बर 2011 को राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (NIPB) के प्रो. नागेन्द्र कुमार सिंह के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने ‘अरहर’ का जीनोम अनुक्रम तैयार किया गया था। यह जीनोम अरहर की लोकप्रिय किस्म ‘आशा’ (Asha) से तैयार किया गया था।

खाद्य व कृषि संगठन (FAO – (मुख्यालय – रोम)) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO (मुख्यालय — जिनेवा)) के मानकों के अनुसार शाकाहारी भोज्य पद्धति में प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 104 ग्राम दालों का उपभोग करना चाहिए।

Note

  • दलहनी फसलों में लोबिया (Black-eyed pea) और मूंग (Mung bean) का उपयोग चारा और हरी खाद के रूप में किया जाता है।
  • उड़द (Vigna mungo) और मूंग (Mung bean) की खेती जायद ऋतु में मुख्यतः सिंचित वाले क्षेत्रों में ही की जाती है।
  • भारत विश्व में दलहनी फसलों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता, एवं आयातक है।
  • मृदा उर्वरता और इसके संरक्षण की दृष्टि से दलहनी फसलें महत्वपूर्ण हैं।

ग्वार (Guar) 

  • इसका उपयोग मुख्यत: जानवरों के चारे के रूप में किया जाता है तथा इसके फली से सब्जी बनाई जाती है।
  • विश्व भर में ग्वार (Guar) के कुल उत्पादन का लगभग 75-80% भारत और पाकिस्तान में होता है।
  • शैल गैस के निष्कर्षण में ‘ग्वार गोंद’ (Guar Gum) का उपयोग किया जाता है।  ‘ग्वार गोंद’ का उपयोग ‘हॉरिजोंटल प्रैकिंग’ (Horizontol Fracking) नामक एक नवीनतम प्रौद्योगिकी के द्वारा शैल गैस के निष्कर्षण के लिए किया जाता है। वर्तमान में इस प्रौद्योगिकी द्वारा शैल गैस के निष्कर्षण में ग्वार का कोई विकल्प मौजूद नहीं है।

Note: ग्वार के बीजों से  ‘ग्वार गोंद’ (Guar Gum) प्राप्त किया जाता है।

खेसारी दाल (Khesari pulses)

  • वर्ष 1961 से भारत में खेसारी दाल (Khesari pulses) के खेती एवं बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, किंतु वर्तमान में इसकी 3 प्रजातियों रतन, प्रतीक एवं महातेओरा की खेती किए जाने की अनुमति हाल ही के वर्षों में केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने प्रदान की है।
  • इसमें ‘डाई अमीनो प्रोपिऑनिक एसिड़’ (di-amino-Pro-Pionic Facid) में पाया जाता है, जिसके कारण के कारण ‘लैथिरिज्म’ (Lathyrism) का खतरा हो सकता है।

Note : लैथिरिज्म (Lathyrism) के कारण में शरीर के निचले भागों में लकवा (paralyzed) हो जाता है तथा हाथ-पांव सुन्न पड़ जाते हैं।

सोयाबीन (Soybean) 

  • यह एक दलहनी फसल है, किंतु इसकी उपयोगिता के आधार पर इसे तिलहनी वर्गव्यापारिक वर्ग की फसलों के अंतर्गत भी रखा जाता है।
  • सोयाबीन (Soybean) में 20-22% तेल तथा 40-45% प्रोटीन पाया जाता है। सोयाबीन की खली में 50% प्रोटीन पाया जाता है, जिसका उपयोग पशुचारे के रूप में जाता है।
  • सोयाबीन (Soybean) से निर्मित दूध गाय के दूध के समान पौष्टिक होता है।

Note :

  • सोयाबीन एक अल्प प्रकाशपेक्षी पौधा है।
  • भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर सोयाबीन की खेती मध्य प्रदेश में की जाती है।

दलहनी फसलों की प्रमुख प्रजातियाँ 

  1. चना – I.C.C.V : 96029, 96030, पूसा-226, पूसा-372 K-850, राधे, विशाल, सम्राट, पूसा चमत्कार, उदय आदि।
  2. मटर – रचना, अपर्णा, सपना (पत्तीविहीन प्रजाति), उत्तरा, पूसा प्रगति (सब्जी) आदि।
  3. मंसूर – प्रिया, वैभव, मलिका,  पूसा, गरिमा, पन्त,  L – 406 आदि।
  4. मूंग – बंसत कालीन – पूसा, बोल्ड 1, पंत – 2, PS – 16, पूसा – 9531,T – 44, मोती, पूसा – 105 आदि।
  5. उड़द – वरदान, T – 9, 65, नरेन्द्र U-1 आदि।
  6. सोयाबीन – पूसा-9814, पूसा-9712 आदि।
  7. अरहर – अमर, आजाद, बहार, मालवीय विकास, पारस, मालवीय चमत्कार आदि।
    • अरहर की नवीनतम प्रजातियाँ – पूसा – 992, पूसा – 991, पूसा – 16, GUAT – 001E, व MA – 6 आदि।

International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics (ICRISAT), हैदराबाद के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा चने के जीनोम को जानने में सफलता प्राप्त की है। इससे पहले भी सोयाबीन और अरहर की जीनोम अनुक्रमण (Genome sequencing) की जा चुकी है।

राइजोबियम प्रजाति का एक जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों सह जीवनयापन करता है, जो वायुमण्डल में उपस्थित नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर उसे पौधों की जड़ों तक पहुंचाते हैं। इसी कारण दलहनी फसलों को  खाद्य की कम आवश्यकता  होती है। कोबाल्ट, राइजोबियम द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए आवश्यक तत्व है।

दलहनी फसलों को मृदा जनित रोगों से बचाने हेतु बुआई के पूर्व 1 किलो बीजों को कैप्टान, बाविस्टान, बॅसिकाल या थाइराम की 2.5 ग्राम मात्रा के साथ बीज शोधन किया जाता है।

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