भारत में पुर्तगालियों का आगमन

भारत में पुर्तगालियों का आगमन

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15वीं शताब्दी में हुई कुछ भौगोलिक खोजों के कारण विश्व के विभिन्न देशों ने समुद्री मार्गों द्वारा आपसी सम्पर्क स्थापित किया। इसी प्रयास के अर्न्तगत स्पेन निवासी कोलम्बस से भारत के समुद्री मार्ग की खोज में निकला किन्तु =अमेरिका पहुंच गया।

बार्थालेम्यू डायज 1457 ई. में ‘आशा अन्तरीप’ (Cape of Good Hope) तक पहुंचा  पहुंचा। समुद्री मार्ग से भारत पहुंचने वाला प्रथम यूरोपीय यात्री वास्को-डी गामा था, जो 17 मई, 1498 को ने भारत के पश्चिमी तट पर स्थिति बन्दरगाह कालीकट पहुंचा, जिसमें उसकी सहायता अब्दुल मनीक नामक गुजराती पथ प्रदर्शक ने की। कालीकट के तत्कालीन शासक जमोरिन ने वास्को-डी गामा का स्वागत किया, जिसका अरब व्यापारियों ने विरोध किया। पुर्तगालियों ने भारत में अपनी पहली कंपनी की स्थापना  1498 ई. में एस्तादो द इंडिया के नाम से की।

भारत में पुर्तगालियों का आगमन

आधुनिक युग में भारत आने वाले यूरोपीय व्यापारियों सर्वप्रथम पुर्तगाली थे। पोप अलेक्जेण्डर षष्ठ (Pope Alexander 6th) ने आज्ञा प्रदान कर पूर्वी समुद्रो में पुर्तगालि व्यापारियों को व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया। बास्कों-डि-गामा ने भारत आने और जाने पर हुए यात्रा व्यय के बदले में लगभग 60 गुना अधिक लाभ कमाया। पुर्तगालियों के भारत आने के दो प्रमुख उद्देश्य थे −
1. अरबों और वेनिस व्यापारियों के प्रभाव को भारत से समाप्त करना।
2. ईसाई धर्म का प्रचार करना।

पुर्तगालियों का उद्देश्य पूर्वी जगत के कालीमिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त था इसके लिए उन्होंने 1503 ई. में कोचीन (भारत) में अपने पहले दुर्ग की स्थापना की।

फ्रांसिस्कों द अल्मेडा (1505 – 1509 ई.)

फ्रांसिस्कों द अल्मेडा (Francisco the Alameda) भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय बन कर आया तथा 1509 ई. तक भारत में रहा। उसने सामुद्रिक नीति (Blue Water Policy) को अधिक महत्व दिया तथा हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की स्थिति को मजबूत करने का प्रयत्न किया। 1509 में फ्रांसिस्कों द अल्मेडा (Francisco the Alameda) ने मिस्त्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त सेना को पराजित कर दीव पर अधिकार कर लिया।

अल्फांसो द अल्बुकर्क (1509 – 1515 ई.)

अल्मेडा के बाद अल्फांसो डी अल्बुकर्क (Afonso de Albuquerque) में द्वितीय पुर्तगाली वायसराय बनकर भारत आया तथा इसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया। 1510 ई. में उसने बीजापुर शासक यूसुफ आदिल शाह को पराजित कर गोवा पर अधिकार कर लिया।

    • 1510 ई. में गोवा पर अधिकार।
    • 1511 ई. में मलक्का पर अधिकार (द.पू.एशिया)।
    • 1515 ई. में फारस की खाड़ी में स्थिति हरमुज पर अधिकार कर लिया।

1515 ई. में अलबुकर्क की मृत्यु के पश्चात उसे गोवा में ही दफना दिया गया।

नीनो-डी-कुन्हा (Nino-de-cunha)

अल्बुकर्क के बाद नीनो-डी-कुन्हा (Nino-de-cunha) पुर्तगाली गवर्नर बनकर भारत आया। 1530 में उसने अपना कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तरित किया और गोवा को पुर्तगाल राज्य की औपचारिक राजधानी बनाया।  उसने 1534 ई. में बसीन और 1535 में दीव पर अधिाकर किया।

जोवा-डी-कास्त्रो (Jova-de-Castro)

नीनो-डी-कुन्हा के बाद जोवा-डी-कास्त्रो (Jova-de-Castro) अगला  पुर्तगाली गवर्नर बनकर भारत आया।


भारत में सबसे पहले पुर्तगालियों का आगमन हुआ किंतु अठारहवी सदी तक उनका भारत में पतन प्रारम्भ हो गया जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित है –

  • धार्मिक असहिष्णुता की नीति,
  • अल्बुकर्क के अयोग्य उतराधिाकारी,
  • डच तथा अंग्रेज शक्तियों का विरोध
  • बर्बरतापूर्वक समुद्री लुटमार की नीति का पालन,
  • स्पेन द्वारा पुर्तगाल की स्वतन्त्रता का हरण आदि।

पुर्तगालियों द्वारा अपने प्रभुत्व के अधीन सामुद्रिक मार्गों पर सुरक्षा कर वसूल करने को कार्टूज व्यवस्था कहा जाता था।

Note:

  1. पुर्तगाल 1560 ई. में गोवा में ईसाई धर्म न्यायालय की स्थापना की।
  2. भारत में गौथिक स्थापत्य कला की शुरुआत पुर्तगालियों ने की।
  3. जहाज निर्माण की प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 ई. में गोवा में हुई।
  4. तंबाकू की खेती की परिचय पुर्तगालियों ने कराया।

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