हरियाणा में राष्ट्रीय आंदोलन

हरियाणा में राष्ट्रीय आंदोलन (National Movement in Haryana )

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Modern History: National Movement in Haryana


1885 की जन क्रांति के बाद लोगो में राष्ट्र के प्रति सम्मान और प्रेम और बड़ने लगा, लोग बढ़-चढ़ कर देश की आजादी के लिए आगे आने लगे। भारतवासियों को राजनीतिक दृष्टि से सुशिक्षित करने के लिए तथा राष्ट्र के गौरव को बढ़ाने के उद्देश्य से 1885 में एक सेवा-मुक्त ब्रिटिश अधिकारी श्री ए.ओ. ह्यूम ने बम्बई के गोकलदास तेजपाल संस्कृत कालेज’ में केवल 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress)” की स्थापना की।

हरियाणा के प्रतिनिधि (Representative of Haryana):

कांग्रेस के 1886 में कलकत्ता में होने वाले दूसरे अधिवेशन में पंडित दीनदयाल शर्मालाला मुरलीधर तथा श्री बालमुकन्द गुप्त ने हरियाणा के प्रतिनिधियों के रूप में भाग लिया था। इन तीनों हरियाणवी जन-नेताओं का अटूट सम्बन्ध उनके पूरे जीवन काल में कांग्रेस से बना रहा और देश के स्वाधीनता-आन्दोलन में इन तीनों नेताओं ने महत्त्वपूर्ण कार्य किये।

पंजाब केसरी के नाम से प्रसिद्ध लाला लाजपत राय ने जहाँ एक ओर भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वहीं दूसरी ओर आर्यसमाज के सुधारवादी आन्दोलन में भी प्रमुख भाग लिया। लाला जी का राजनीतिक जीवन हरियाणा से आरम्भ हुआ था। उन्होंने अपना राजनीतिक और सामाजिक कार्य-क्षेत्र हिसार को बनाया। सन् 1888 में आयोजित कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में, जो इलाहाबाद में हुआ था, लाला लाजपतराय ने जिला हिसार के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।

* लाला मुरलीधर को ग्रैंड ओल्ड मन of पंजाब भी कहा जाता है।

हरियाणा में 1909 में ‘मिन्टो रिफार्मर्ज’ का प्रभाव
(Impact of ‘Minto Reformer’ in Haryana in 1909)

1909 में ‘मिण्टो रिफार्मर्ज’ लागू होने से रोहतक, गुड़गांव और हिसार में जिला कमेटियों के मत से पंजाब विधान सभा के लिए एक सदस्य के चुनाव की स्वीकृति दी गई। उधर करनाल, अम्बाला और शिमला का, दूसरा निर्वाचन क्षेत्र बना। पहली बार हरियाणा में विधान सभा का निर्वाचन इस सीमित आधार पर आयोजित किया गया। पहले चुनाव में रोहतक हिसार क्षेत्र से हिसार निवासी बाबू जवाहर लाल भार्गव सदस्य चुने गये और करनाल क्षेत्र से मौलवी अब्दुल गनी, सदस्य निर्वाचित हुए। मिण्टो सुधार के अधीन विधान सभा के चुनाव हर तीसरे वर्ष होते थे। इन चुनावों में जानबूझ कर ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों के लिए अलग से स्थान सुरक्षित किये थे जिससे कि हिन्दू-मुसलमानों के बीच राजनीतिक क्षेत्र में ऐसी खाई खोद दी जाये जिससे दोनों समुदाय अपने को अलग-अलग राजनीतिक इकाइयां समझने लगे।

दिल्ली भारत की नई राजधानी बन गई
(Delhi become new capital of India)

सन् 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की गई और बंगाल का एकीकरण कर दिया गया। कलकत्ता से दिल्ली, राजधानी का स्थानांतरण होने से हरियाणा को बड़ा लाभ हुआ। क्योंकि दिल्ली ही देश की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र बनी, इसीलिए दिल्ली के आस-पास के इस प्रदेश में जागृति की लहर बड़ी तेजी से फैली।

रोलेट एक्ट का हरियाणा में विरोध
(Rowlatt Act opposed in Haryana)

फरवरी 1919 में ‘रोलट एक्ट’ नामक कानून लागू कर दिया गया। जिसका विरोध देश भर में हुआ। इसके विरोध में भारतीय नेताओं की ओर से घोषणा की गई कि 30 मार्च, 1919 का दिन ‘काले कानून के विरोध-दिवस के में मनाया जाये। परन्तु बाद में कुछ कारणों से 6 अप्रैल का दिन विरोध-दिवस के रूप से मनाये जाने का निश्चित हुआ। इस दिन दिल्ली और हरियाणा के अनेक स्थानों पर फिर विरोध-सभाएं हुईं, जुलूस निकाले गये। 8 अप्रैल, 1919 के दिन पलवल में गांधी जी गिरफ्तार कर लिया गया । 8 अक्टूबर, 1920 को महात्मा गांधी, मुहम्मद अली, शौकत अली के साथ रोहतक पधारे। एक विराट जनसभा हुई जिसका आयोजन बाबू श्यामलाल, श्री मुहम्मद शफी और सरदार बूटासिंह ने किया था। रोहतक की इस ऐतिहासिक जनसभा ने राजनीतिक वातावरण में गर्मी पैदा की। उस समय हरियाणा के राजनीतिक जन-जागरण में, रोहतक और भिवानी मुख्य केन्द्र बन गये थे। रोहतक की तरह भिवानी में भी अनेक कर्मठ कार्यकर्ता काम कर रहे थे जिनमें पं. नेकीराम शर्मा, श्री के.ए. देसाई, लाला उग्रसेन मुख्य थे। अक्टूबर, 1920 में अम्बाला मण्डल की ‘डिवीजनल पोलिटीकल कान्फ्रेंस’ भिवानी में हुई। इस ऐतिहासिक कान्फ्रेंस में गांधी जी अली भाइयों के साथ आये। कान्फ्रेंस में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, श्री सत्यदेव, लाला मुरलीधर तथा लाला दुनी चन्द अम्बालवी सरीखे अग्रणी नेताओं ने भाग लिया।

साइमन कमीशन का विरोध
(Opposed to the Simon Commission)

हरियाणा का प्रबुद्ध समाज पूरी तरह स्वतंत्रता-आन्दोलन का अंग बन गया था। साइमन कमीशन ने 3 फरवरी, 1928 को जब भारत की धरती पर कदम रखा तो पूरे देश ने नारा बुलन्द किया-‘साइमन कमीशन वापस जाओ (Simon Go back)।’ साइमन कमीशन लाहौर पहुँचा तो लाला लाजपतराय के नेतृत्व में विशाल जनसमुदाय ने काले झंडों से उसका स्वागत किया। ब्रिटिश सरकार ने लाला जी पर लाठियां बसाई जिनकी चोट वह सह न सके और उनकी मृत्यु हो गई। लाहौर के अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिसम्बर, 1929 में  ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा बुलन्द किया। कांग्रेस कार्यकारिणी ने 26 जनवरी, 1930 का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

हरियाणा में स्वतंत्रता दिवस 
(Independence Day in Haryana)

12 जनवरी, 1932 को पंजाब प्रदेश-कांग्रेस के आदेश पर पूरे हरियाणा में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। इस दिन रोहतक में राव मंगली राम के नेतृत्व में एक विराट जुलूस निकाला गया। पुलिस ने जुलूस पर लाठी-चार्ज किया जिसमें अनेक स्वयं-सेवक घायल हुए, अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया परन्तु पुलिस के इतने क्रूर व्यवहार और अत्याचारों के बाद भी धरनों, प्रदर्शनों और जलसों का दौर चलता रहा। कुछ दिनों बाद रोहतक में जिलाधीश की कोठी पर तिरंगे झंडे को लहरा दिया गया। इससे पूरे नगर में अपूर्व उत्साह का संचार हुआ। इसके बाद भिवानी, सिरसा, करनाल, रिवाड़ी, सोनीपत और गोहाना में भी जोरदार आन्दोलन चले।

28 दिसम्बर, 1935 को पूरे हरियाणा में कांग्रेस की स्वर्ण-जयन्ती मनाई गई। रोहतक, भिवानी, हिसार, अम्बाला, करनाल, रिवाड़ी, सिरसा, पलवल और सोनीपत आदि नगरों में स्वर्णजयन्ती का विशेष जोर रहा।

 1937 में पंजाब प्रांतीय असेम्ब्ली के चनाव हए। कांग्रेस ने प्रत्येक स्थान पर अपने उम्मीदवार खड़े किये। दिल्ली और मंजाब से प्रमुख कांग्रेसी नेता हरियाणा के शहरों और कस्बों में चुनाव अभियान को गति देने पहँचे। कांग्रेस का यनियनिस्ट पार्टी से जोरदार मुकाबला था। सब होते हुए भी कांग्रेस शहरी क्षेत्रों से केवल दो स्थानों पर ही सफलता प्राप्त कर सकी। नगरों के उन दोनों क्षेत्रों से पंडित श्रीराम शर्मा और लाला देशबन्धु गुप्त सफल हए। एक वर्ष बाद सिरसा का स्थान खाली हुआ और कांग्रेस उम्मीदवार चौधरी साहब राम चुनाव में सफल हुए।

सन् 1937 के इस चुनाव में जमींदारा लीग के चौधरी छोटूराम, चौधरी टीकाराम, चौधरी रामस्वरूप, चौधरी सेफअली, चौधरी यासीन खाँ, चौधरी सूरजमल, चौधरी हेतराम, चौधरी कुंजपुरा सफल हुए। राजा नरेन्द्रनाथ की हिन्दुसभा के राव बलबीर सिंह और लाला आत्माराम कामयाब हुए।

जमींदारा लीग की यह सफलता वास्तव में जनता की सफलता नहीं थी अपितु चुनाव की उस कूटनीति की सफलता थी जो अंग्रेज सरकार ने अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए अपनाई हुई थी।

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