उत्तराखंड से संबंधित प्रमुख तथ्य

उत्तराखंड से संबंधित प्रमुख तथ्य (Part 7)

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  • कुणिंद उत्तराखंड में शासन करने वाली प्रथम राजनीतिक शक्ति थी, इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अमोघभूति था।
  • अमोघभूति की रजत एवं ताम्र मुद्राएं पश्चिमी में व्यास से लेकर अलकनंदा तक तथा दक्षिण में सुनेत तथा वेहत तक प्राप्त हुई है।
  • अमोघभूति प्रकार की मुद्राओं में अग्र भाग पर देवी तथा मृग का अंकन तथा प्राकृत भाषा में राज्ञ कुणिन्द-अमोघभूति महरजस अंकित है।
  • अमोघभूति की मृत्यु के पश्चात इस क्षेत्र में शकों का अधिकार हो गया था।
  • 6वी. शदी के उत्तरार्द्ध  उत्तराखंड पर कन्नौज के मौखरियों ने अधिकार कर लिया था। हर्ष के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उत्तराखण्ड की यात्रा की थी।
  • बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित्र में हर्षवर्धन के शासनकाल में उत्तराखण्ड भ्रमण पर आने वाले लोगों का वर्णन मिलता है।
  • जौनसार-भाबर काला डांडा (पौड़ी गढ़वाल) से यौधेय शासकों की मुद्राएँ प्राप्त हुई है।
  • शीलवर्मन द्वारा बाड़वाला यज्ञ-वेदिका का निर्माण करवाया गया था।
  • कार्तिकेयपुर राजवंश को उत्तराखंड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है।
  • कल्हण द्वारा रचित राजतंरगिणी से कश्मीर के इतिहास की जानकारी मिलती है, जिसमें कश्मीरी राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण कर उसे जीतने का उल्लेख मिलता है।
  • कत्यूरी वंश का शासक खर्परदेव, कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालीन था। कल्याणराज की पत्नी का नाम महारानी लद्धादेवी था।
  • कत्यूरी शासक निम्बर देव, शैव मतावलम्बी था, उसने जागेश्वर में विमानों का निर्माण करवाया था।
  • निम्बर देव के बाद उसका पुत्र ईष्टगण शासक बना। ईष्टगण, प्रथम शासक था, जिसने संपूर्ण उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया।
  • बागेश्वर लेख के अनुसार कार्तिकेयपुर राजवंश का संसथापक बसन्त देव था।
  • कार्तिकेयपुर वंश के शासक भूदेव ने बैजनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। भूदेव द्वारा बौद्ध धर्म का विरोध किया गया था।
  • कार्तिकेयपुर वंश के शासक इच्छरदेव द्वारा सलौड़ादित्य वंश की स्थापना की गयी थी।
  • उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में यह प्रचलित है कि कार्तिकेयपुर वंश के अवसान पर सूर्यास्त हो गया।
  • कार्तिकेयपुर राज वंश की राजभाषा और लोकभाषा क्रमशः संस्कृत और पालि थी।
  • कार्तिकेयपुर शासकों के समय उत्तराखंड में आदि गुरू शंकराचार्य का आगमन हुआ था, आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा 820 ई. में केदारनाथ में अपने शरीर का परित्याग किया गया।
  • लक्ष्मीदत्त जोशी के अनुसार कार्तिकेयपुर के राजा मूलतः अयोध्या के थे, तथा कार्तिकेय उनके कुल देवता थे।

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