Formation of Haryana State

हरियाणा राज्य का गठन (Formation of Haryana State)

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1947 में जब भारत की आजादी के 19 साल बाद ही एक राज्य के रूप में गठन  हुआ। देश की आजादी के समय हरियाणा पंजाब प्रदेश  का ही हिस्सा था, लेकिन राज्य में देश की आजादी के कुछ साल बाद से ही भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग उठने लगी।

राज्य के लोगों को यह अनुभव होने लगा कि पंजाब में उनकी उपेक्षा हो रही है और उन्हें समुचित महत्त्व नहीं दिया जा रहा है। हरियाणा वासियों ने महसूस किया कि पंजाब प्रशासन में उनकी कोई सुनवायी नहीं होती है। इन सभी कारणों से पंजाब में प्रताप सिंह कैरो के शासन काल के दौरान ही हरियाणा प्रदेश की मांग उठने लगी। साथ ही लाला देशबन्धु गुप्त और आसफ अली ‘वृहत्तर दिल्ली (Greater Delhi)’ की मांग कर रहे थे जिसमें हरियाणा को शामिल करने का सुझाव था।

पंजाबी भाषा को राज्य भाषा न मानना (Punjabi language is not considered as state language)

1955 में भारत सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की जिसका काम भाषाई आधार पर प्रान्तों का सीमांकन करना था। परन्तु इस आयोग ने भी पंजाब विभाजन का मांग को अस्वीकार कर दिया था। किन्तु राज्य पुनर्गठन आयोग ने पटियाला और पूर्वी पंजाब स्टेट्स को पंजाब क्षेत्र में तथा महेन्द्रगढ़ व् जीन्द को हरियाणा क्षेत्र में शामिल करने की सिफारिश  की थी। लेकिन वास्तविक समस्या जैसी की तैसी ही बनी रही क्योंकि हरियाणा अधिकतर हिन्दी भाषी था और पंजाबी भाषा को राज्य भाषा व् शिक्षा का आधार मानने को बिल्कुल तैयार नहीं था।

पंजाब पुनर्गठन एक्ट (Punjab Reorganization Act)

1965 में भारत सरकार ने लोकसभा के अध्यक्ष सरदार हुक्म सिंह की अध्यक्षता में पंजाब विभाजन पर विचार करने लिए एक संसदीय समिति का गठन किया। समिति की सिफारिश के आधार पर सरकार मार्च 1966 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री जयंतीलाल छोटेलाल शाह (Mr Jayantilal Chhotalal Shah) की अध्यक्षता में पंजाब सीमा आयोग का गठन किया। आयोग द्वारा पंजाब सीमांकन के पश्चात् सितम्बर 1966 में संसद ने पंजाब पुनर्गठन एक्ट पारित किया। इस प्रकार लम्बे संघर्ष के बाद 1 नवम्बर, 1966 को सत्रहवें (17th ) राज्य के रूप में हरियाणा राज्य का गठन हुआ।

हरियाणा सरकार का गठन (Government of Haryana formed)

श्री धर्मवीर को राज्य का प्रथम राज्यपाल नियुक्त किया गया। राज्यपाल ने राष्ट्रपति की सलाह पर उस समय राज्य में चुनाव न कराकर पंजाब विधान-सभा से ही हरियाणा के विधायकों को लेकर हरियाणा विधान सभा का गठन किया। उस समय पंजाब राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी से बाहर आये कांग्रेस विधायकों द्वारा नवगठित हरियाणा विधान सभा में पं. भगवत दयाल शर्मा को अपना नेता चुनने के बाद प्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री बनाया गया।

1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को विधान सभा में 81 में से 48 स्थान मिले जबकि लोकसभा की नौ में से सात सीट कांग्रेस ने प्राप्त की। श्री भगवत दयाल शर्मा पुनः मुख्यमंत्री बने। परन्तु सात दिनों के बाद ही पार्टी की आन्तरिक कलह के कारण विधान सभा अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार दयाकिशन को विशाल हरियाणा पार्टी के उम्मीदवार राव वीरेन्द्र सिंह के हाथों पराजित होना पड़ा। श्री दयाकिशन को 37 और राव वीरेन्द्र सिंह को 40 मत मिले। इस प्रकार नये राज्य का गठन हुआ।

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