CTET January 2021 – Paper II (Hindi Langauge II) Answer Key

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परीक्षा (Exam) – CTET Paper I Primary Level (Class VI to VII) 
भाग (Part) – Part I – Hindi Language II
परीक्षा आयोजक (Organized) – CBSE
कुल प्रश्न (Number of Question) – 30
परीक्षा तिथि (Exam Date) – 31st January 2021 (2nd Shift)


निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. जसे 128 तक) के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :

घायल बाज़ फिर उड़ना चाहता था । उसने किसी जह साहस बटोरकर उड़ान भरी और थोड़ी देर पंख पडफड़ाकर उड़ने के बाद नीचे गिर गया । सौंप ने भी बाई पर बने अपने खोखल से निकलकर अपने को आसमान में छोड़ दिया और नीचे जा गिरा । साँप कहने तगा____

“सो उड़ने का यही आनंद है – भर पाया मैं तो ! पक्षी भी कितने मूर्ख हैं । धरती के सुख से अनजान रहकर आकाश की ऊँचाइयों को नापना चाहते थे । किंतु अब नि जान लिया कि आकाश में कुछ नहीं रखा । केवल हर-सी रोशनी के सिवा वहाँ कुछ भी नहीं, शरीर को संभालने के लिए कोई स्थान नहीं, कोई सहारा नहीं । फिर वे पक्षी किस बूते पर इतनी डींगें हाँकते हैं, किसलिए धरती के प्राणियों को इतना छोटा समझते हैं । अब मैं कभी धोखा नहीं खाऊँगा, मैंने आकाश देख लिया और खूब देख लिया । बाज़ तो बड़ी-बड़ी बातें बनाता था, आकाश के गुण गाते थकता नहीं था । उसी की बातों में आकर मैं आकाश में कूदा था । ईश्वर भला करे, मरतेमरते बच गया । अब तो मेरी यह बात और भी पछी हो गई है कि अपनी खोखल से बड़ा सुख और कहीं नहीं है । धरती पर रेंग लेता हूँ, मेरे लिए यह बहुत कुछ है । मुझे आकाश की स्वच्छंदता से क्या लेना-देना ? न वहाँ छत है, न दीवारें हैं, न रेंगने के लिए जमीन है । मेरा तो सिर चकाने लगता है। दिल काँप-काँप जाता है । अपने प्राणों को खतरे में डालना कहाँ की चतुराई है ?”

साँप सोचने लगा कि बाज़ अभागा था जिसने आकाश की आज़ादी को प्राप्त करने में अपने प्राणों की बाजी लगा दी। … किंतु कुछ देर बाद साँप के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । उसने सुना, चट्टानों के नीचे से एक मधुर, हस्यमय गीत की आवाज़ उठ रही है । पहले उसे अपने कार्मा पर विश्वास नहीं हुआ।

किंतु कुछ देर बाद गीत के स्वर अधिक साफ़ सुनाई देने लगे । वह अपनी गुफा से बाहर आया और चट्टान से नीचे झाँकने लगा । सूरज की सुनहरी किरणों में समुद्र का नीला जल झिलमिला रहा था। लोग मिलकर गा रहे थे.

“ओ निडर बाज़! शत्रुओं से लड़ते हुए तुमने अपना कीमती रक्त बहाया है । पर वह समय दूर नहीं है, जब तुम्हारे खून की एक-एक बूंद जिंदगी के अँधेरे में प्रकाश फैलाएगी और साहसी, बहादुर दिलों में स्वतंत्रता और प्रकाश के लिए प्रेम पैदा करेगी।

तुमने अपना जीवन बलिदान कर दिया किंतु फिर भी तुम अमर हो । जब कभी साहस और वीरता के गीत गाए जाएंगे, तुम्हारा नाम बड़े गर्व और श्रद्धा से लिया जाएगा।”

121. “कीमती रक्त” में दोनों शब्द क्रमशः हैं –
(1) संज्ञा, सर्वनाम
(2) उद्देश्य, विधेय
(3) विशेष्य, विशेषण
(4) विशेषण, विशेष्य

122. ‘ओ निडर बाज़!’ उपर्युक्त पद में कारक की पहचान कीजिए
(1) संबंध कारक
(2) संबोधन कारक
(3) कर्ता कारक
(4) कर्म कारक

123. ‘स्वतंत्रता’ के पद परिचय के बारे में क्या उपयुक्त नहीं है?
(1) ‘ता’ उपसर्ग
(2) एकवचन
(3) संज्ञा
(4) भाववाचक

124. घायल होते हुए भी बाज़ ने उड़ान भरी, क्योंकि –
(1) उसे मुक्त आकाश की स्वच्छंदता प्रिय थी।
(2) उसे अपनी निडरता का प्रमाण देना था।
(3) उड़ना उसकी विवशता थी।
(4) इससे वह शीघ्र अच्छा हो सकता था।

125, “भर पाया मैं तो …… साँप के इस कथन का आशय है
(1) आनंद आ गया, अब बैठा रहूँगा।
(2) समझ गया, अब धोखा नहीं खाऊँगा।
(3) देख लिया, अब नहीं देचूंगा ।
(4) मन भर गया, अब नहीं उडूंगा ।

126. आकाश के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और वे कथन चुनिए जिन्हें साँप असत्य मानता है:
(i) वहाँ ढेर सारी रोशनी है।
(ii) वहाँ कोई आधार नहीं है।
(iii) वहाँ सुख ही सुख है।
(1) (ii) और (ii)
(2) केवल (iii)
(3) केवल (i)
(4) (i) और (ii)

127. साँप सोचने लगा, “बाज़ अभागा था ……” क्योंकि
(1) आज़ादी के लिए उसने जान की बाज़ी लगा दी।
(2) प्रयास करने पर भी वह उड़ नहीं पाया ।
(3) उसने घायल अवस्था में भी उड़ना चाहा ।
(4) वह बहुत घायल हो गया था।

128. साँप के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि –
(1), लोग बाज़ की वीरता के गीत गा रहे थे।
(2) लोग साँप की समझदारी की प्रशंसा कर रहे थे।
(3) घायल बाज़ उड़ने लगा था।
(4) सूरज की किरणों से समुद्री जल झिलमिला रहा था।

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों पर संख्या 129 से 135 तक) के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :

जिंदगी में धूप-छाँव के सिद्धांत को मानने वाले फूलों के साथ काँटों की मौजूदगी की शिकायत नहीं करते । संभव नहीं कि बिना अड़चन और चुनौतियों के दैनिक कार्य या विशेष कार्य संपन्न होते चले जाएँ । जोन अप्रिय, अप्रत्याशित घटनाओं से जूझने के लिए स्वयं को तैयार नहीं रखेंगे उनके लिए जीवन अभिशाप बन जाएगा । वे पग-पग पर चिंतित और दुखी रहेंगे और संघर्षों के उपरांत मिलने वाले आनंद से वे वंचित रह जाएँगे । मुश्किल परिस्थितियों में संयत, धीर व्यक्ति भी विचलित हो सकता है । सन्मार्ग पर चलने वाले की राह में कम बाधाएँ नहीं आती।

हम जीवित हैं तो कठिनाइयाँ, चुनौतियाँ आएंगी ही । किंतु स्मरण रहे, कठिनाइयों और बाधाओं का प्रयोजन हमें तोड़ना-गिराना नहीं बल्कि ये हमें सड़ करने के माध्यम हैं । बाधाओं का सकारात्मक पक्ष यह है कि कठिनाइयों से निबटने में उन कौशलों और जानकारियों का प्रयोग आवश्यक होता है जो सामान्य अवस्था में सुषुप्त, निष्क्रिय पड़ी रहती हैं और दुष्का परिस्थितियों से जूझने पर ही सक्रिय स्थिति में आती हैं । सुधी जन को यह पता होता है। अमेरिकी रंगकर्मी और पत्रकार विल रोजर्स ने कहा, ‘कठिनाई से उबरने का मार्ग इसी के बीच मिल जाता है। समस्याओं से नहीं जूझेंगे तो ये विशिष्ट कौशल स्थायी रूप से क्षीण हो जाएँगे तथा व्यक्ति समय तौर पर जीने में अक्षम हो जाएगा।

हो सकता है कोई व्यक्ति एक तख्त पर सोते हुए कष्ट महसूस करे जबकि दूसरा व्यक्ति उसी तख्त को आरामदायक महसूस करे । मगर यह असमानता आरभिक स्तर की है। आंतरिक या मूलगत भाव त एक व्यक्ति की दूसरे से कोई भी भिन्नता नहीं है।

जिसका मन जितने विस्तृत क्षेत्र के विषयों का और भागता है उसके लिए मन को एकाग्र करना उतन ही मुश्किल होता है। लेकिन एक व्यक्ति के मन आकर्षित करने वाली वस्तुएँ किसी अन्य मन, मानसिक स्तर पर प्रभावित कर सकती है और किसी अन्य व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में मर भी साबित हो सकती हैं। इसी बिंदु पर यह समझने की है कि दूसरे के प्रति अपनी पवित्र भावना के द्वारा हम अनेक व्यक्तियों की मानस तरंगों में परिवर्तन कर सकते हैं।

129. लेखक का कथन है कि आरंभिक स्तर की असमानता के होते हुए भी भीतरी भाव से
(1) एक – दूसरे में कोई भिन्नता नहीं होती।
(2) हमें कौशलों और जानकारियों का उपयोग करना होता है।
(3) सब लोग एक-सा सोचते हैं।
(4) मनुष्य विषयों की ओर भागता है।

130. ‘निष्क्रिय’ शब्द के लिए सबसे उपयुक्त विपरीतार्थक शब्द होगा
(1) कार्यशील
(2) सकर्मक
(3) क्रियाहीन
(4) सक्रिय

131. अन्य व्यक्तियों की मानसिक तरंगों में परिवर्तन करना संभव है –
(1) उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके।
(2) अपनी शुभ और पवित्र भावना के द्वारा ।
(3) उसे सुझाव देकर ।
(4) उसे समझाकर कि सुख-दुःख अभिन्न हैं ।

132. ‘जिंदगी में धूप-छाँव के सिद्धांत को मानने वाले फूलों के साथ काँटों की शिकायत नहीं करते’ – क्योंकि वे जानते हैं कि –
(1) अप्रत्याशित घटनाओं से जूझना ही पड़ता है।
(2) शिकायत करना कोई अच्छी आदत नहीं।
(3) सुखों के साथ दुःख भी आते हैं।
(4) दैनिक कार्य संपन्न होते रहते हैं।

133. किनका जीवन अभिशाप बन जाता है ?
(1) जो जिंदगी में धूप-छाँव के सिद्धांत को मानते हैं
(2) जो सदा सन्मार्ग पर चलते हैं।
(3) जो शिकायतें ही करते रहते हैं।
(4) जो अप्रिय घटनाओं से जूझने को तैयार नहीं रहते।

134. लेखक मानता है कि कठिनाइयों का वास्तविक प्रयोजन है
(1) हमारा दृष्टिकोण बदलना
(2) हमें सुदृढ़ करने का माध्यम बनना
(3) हमें तोड़ना – गिराना
(4) हमारे मार्ग में रुकावटें पैदा करना

135. लेखक के अनुसार यह असंभव है कि-
(1) संघर्षों के बाद हम आनंदों से वंचित रह जाएँ।
(2) फूलों के साथ काँटे न मिलें।
(3) किसी के जीवन में सदा सुख ही सुख रहें ।
(4) बिना अड़चन के कार्य होते चले जाएँ।

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