परिसंचरण तंत्र (Circulatory System)

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सभी छोटे-बड़े जंतुओं के शरीर के भीतर ऑक्सीजन, भोजन, हॉर्मोन्स आदि पदार्थों को आवश्यकतानुसार उपयुक्त अंगों में पहुंचाने के लिए एक सुविकसित परिसंचारी तंत्र होता हैं, जिसे परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) कहते हैं। परिसंचरण तंत्र वाहनियों और नलियों के जाल द्वारा बना होता है। परिसंचारी तंत्र को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • रूधिर परिसंचरण तंत्र (Blood circulation system)
  • लसिका परिसंचरण तंत्र (Lymph circulation system)

रूधिर परिसंचरण तंत्र (Blood circulation system)

Blood Circulatory System

रूधिर परिसंचरण तंत्र (Blood circulation system) को मानव शरीर का परिवहन तंत्र माना जाता है। मानव शरीर में रूधिर का परिसंचरण हृदय (Heart) की पम्प क्रिया द्वारा संपन्न होता हैं और धमनियों (Arteries) में रूधिर प्रवाहित होता रहता है। हृदय (Heart) का संकुचन शिराओं में रूधिर प्रवाह के लिए पर्याप्त नहीं होता है। इसके लिए कुछ मांसपेशियां होती हैं जो हृदय (Heart) में रूधिर को आगे-पीछे करने के लिए शिराओं (Veins) को संकुचित करती हैं और दबाव डालती हैं। मनुष्य, अन्य स्तनधारी, पक्षी और मगरमच्छ में हृदय दो अलग-अलग मार्गों या सर्किट में रूधिर को पम्प करता है। इन्हें सामान्य परिसंचरण और फुफ्फुसीय परिसंचरण कहते हैं।

सामान्य परिसंचरण – इसमें रूधिर हृदय से सीचे शरीर के ऊतकों के लिए जाता है और फिर वापस हृदय में आ जाता है।

फुफ्फुस परिसंचरण – फुफ्फसों को रक्त पहुंचाने का कार्य फुफ्फुसीय परिसंचरण द्वारा पूरा होता है। वाहिकाएं अशुद्ध रक्त को हृदय से फुफ्फुस तक ले जाती हैं और वहां रक्त शुद्ध होकर दोबारा हृदय (Heart) में आ जाता है यहाँ से शुद्ध होकर रक्त बाकि शरीर में वितरित होता है।

मानव शरीर में रूधिर परिसंचरण (Blood circulation) दो प्रकार से होता है, जो निम्नलिखित है –

खुला परिसंचरण तंत्र (Open circulatory system)

  1. यह एक निम्न चाप तंत्र है।
  2. सामान्यतः निश्चित रूधिर वाहनियों का अभाव होता है। रूधिर अवकाश अवनमित देहगुहीय अवकाशों के रूपांतर होते हैं।
  3. हृदय द्वारा रूधिर या रूधिर लसिका को धीरे-धीरे दबाव के साथ निकाला जाता है परंतु यह हृदय में बिल्कुल धीरे से लौटता है।
  4. इसमें रूधिर लगभग स्वतंत्र रूप से ऊतकों के बीच घूमता है और अंत में हृदय में लौट आता है।

बन्द परिसंचरण तंत्र (Closed circulatory system)

  • हृदय इस तंत्र का सबसे अच्छा उदाहरण है।
  • यह एक उच्च ताप तत्र है।
  • निश्चित रूधिर वाहिनियां विद्यमान होती हैं।
  • कशेरुकी, शीर्षपदी और एकाइनोडर्म प्राणियों में बंद परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।
  • इस तंत्र में रूधिर हृदय से धमनियों द्वारा विभिन्न भागों में जाकर कोशिकाओं द्वारा ऊत्तको तथा कोशिकाओं में जाता है तथा ऊत्तकों व कोशिकाओं में स्वतंत्र रूप से खुले बिना ही शिराओं द्वारा इकट्ठा होकर हृदय में लौट आता है।
  • मनुष्य में विकसित बन्द तथा दोहरा परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।

लसिका परिसंचरण तंत्र (Lymph circulation system)

जब रुधिर (Blood) केशिकाओं (Capillaries) से होकर बहता है तब उसका द्रव भाग (रुधिर रस) कुछ शारीरिक, भौतिक और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के द्वारा केशिकाओं (Capillaries) की पतली दीवारों के माध्यम से बाहर निकल जाता है। बाहर निकले हुए इसी द्रव भाग (रुधिर रस) को लसिका (Lymph) कहते है। यह वस्तुत: रुधिर ही है, जिसमें केवल रुधिरकणों का अभाव रहता है। लसीका का शरीरस्थ अधिष्ठान लसीकातंत्र (Lymphatic System) कहलाता है। इस तंत्र में लसीका अंतराल (space), लसीकावाहिनियों और वाहिनियों के बीच बीच में लसीकाग्रंथियाँ रहती हैं।

लसीका का प्रवाह

24 घंटों में लसिका (Lymph) पथों से निकलकर रक्त में प्रवेश करने वाली लसिका (Lymph) का परिमाण बहुत अधिक होता है। यह देखा गया है कि आहार पूरा मिलने पर रक्त के बराबर परिमाण में ही लसिका (Lymph) 24 घंटों में दक्षिण और बाईं शाखाओं से गुजरती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि लसिका (Lymph) संस्थान में लसिका (Lymph) का प्रवाह अति शीघ्र होना चाहिए।

रुधिर परिसंचरण को बनाए रखने के लिए शरीर में हृदय की व्यवस्था है। लसिका (Lymph) परिवहन के लिए लसिका (Lymph) के आगे की ओर गति निम्नलिखित कारणों पर निर्भर करती है :

  • दबाव का अंतर – भौतिक नियमों के अनुसार द्रव पदार्थ अधिक दबाव से कम दबाव की ओर प्रवाहित होते हैं। लसिका (Lymph) के उत्पत्ति स्थान से लसिका (Lymph) अंतराल से लक्ष्य स्थान ग्रीवा की शिराओं के दबाव में काफी अंतर है। अत: दबाव के इस अंतर के कारण, प्रवाह आगे जारी रहता है।
  • वक्षीय चूषण (Thoracic Aspiration)।
  • लसिका वाहिनी का नियमित संकोच ( Regular hesitation of the lymph vessel.)
  • शरीर की चेष्टाएँ (Body efforts)
  • लसिका वाहिनी में स्थित कपाट (Valves located in the lymph Vessel)

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