केंद्र और राज्य संबंध

संविधान में केंद्रीय व्यवस्था के अनुरूप केंद्र तथा राज्य संबंधों की विस्तृत विवेचना की गयी है अत: भारतीय एकता व अखंडता के लिए केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है |  केंद्र व राज्य के मध्य संबंधो का अध्यनन तीन दृष्टिकोण से किया जाता है –

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अधीनस्थ न्यायालय

भारतीय संविधान के भाग-6 में अनु० – 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित है जो उच्च न्यायालय के अधीन होते है तथा इनका गठन राज्य अधिनियम कानून के द्वारा होता है | जिला न्यायाधीश की नियुक्ति जिला न्यायाधीश की नियुक्ति व पदोन्नति  राज्यपाल द्वारा राज्य

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उच्च न्यायलय की शक्तियां व क्षेत्राधिकार

उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है अत: उच्च न्यायालय राज्य में अपील करने का सर्वोच्च न्यायालय होता है | उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार निम्न लिखित है – मूल क्षेत्राधिकार  न्यायदेश (रिट) क्षेत्राधिकार  अपीलीय क्षेत्राधिकार  अभिलेखीय क्षेत्राधिकार  पर्यवेक्षीय क्षेत्राधिकार 

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उच्च न्यायालय (High Court)

भारत में उच्च न्यायालय का गठन सर्वप्रथम 1862 में एक साथ तीन प्रान्तों कलकत्ता (Calcutta) , बंबई ( Bombay) व मद्रास (Madras) में  हुआ तथा 1866 में चौथे उच्च न्यायालय की स्थापना इलाहाबाद (Allahabad) में की गई | अत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1950 में प्रान्तों के उच्च न्यायालयों को राज्यों के उच्च

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उच्चतम न्यायालय की शक्तियां व क्षेत्राधिकार

भारतीय संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय को व्यापक शक्तियां व क्षेत्राधिकार प्रदान किए गए है । ब्रिटेन के उच्च सदन (House of Lords) की तरह भारत में उच्चतम न्यायालय को न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्राप्त है जिसे निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है — मूल /

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उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रता 

उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रता  सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह से करता है| सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सिद्ध कदाचार व दुर्व्यवहार के आधार पर हटाया जा सकता है | सदन में न्यायधीशों के आचरण

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उच्चतम न्यायालय (Supreme court)

भारत में एकल न्याय व्यवस्था की स्थापना की गई है जिसमें शीर्ष स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय (S.C) व उसके अधीन 24 उच्च न्यायालय है। भारतीय संविधान के भाग – 5 में अनु०- 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय के गठन , स्वतंत्रता , न्यायक्षेत्र ,

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विधानमंडल में विधायी प्रक्रिया

विधानमंडल  में पेश होने वाले विधेयकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। सरकारी विधेयक गैर-सरकारी विधेयक साधारण विधेयक (Ordinary bill) साधारण विधेयकों को किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है , इसके अंतर्गत वितीय विषयों को छोड़कर अन्य सभी विषयों

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विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी

राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन का अपना पीठासीन अधिकारी होता है । विधानसभा के लिए अध्यक्ष व उपाध्यक्ष और विधान परिषद् के लिए सभापति व उप-सभापति होते है ।  विधानसभा अनु० – 178 के अनुसार प्रत्येक राज्य की विधानसभा अपने सदस्यों के मध्य से ही विधानसभा

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राज्य विधानसभा (State Assembly)

राज्य विधानसभा के सदस्यों (प्रतिनिधियों) का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है , विधानसभा में प्रतिनिधियों की संख्या राज्य की जनसँख्या के आधार पर निर्धारित होती है। विधानसभा में प्रतिनिधियों की अधिकतम संख्या 500 व न्यूनतम संख्या  60 निर्धारित की गई किंतु कुछ राज्यों हेतु

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