कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural economics)

कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural economics)

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कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural economics) विज्ञान की वह शाखा है, जिसके सिद्धांतो का प्रयोग कर फसल उत्पादन एवं पशुपालन को अधिक उपयोगी बनाने के प्रयासों का अध्ययन किया जाता है। पहले इसे एग्रोनॉमिक्स (Agronomics) कहा जाता था, जिसमें फसलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए भूमि की गुणवत्ता बनाएं रखने के लिए अध्ययन किया जाता था।

उत्पादन (Production)

उत्पादन वह प्रक्रिया है, जिसमें कच्चे माल (raw materials) को अन्य सामान व सेवाओं में परिवर्तित किया जाता है।

उत्पादन के कारक (Factors of production)

किसी सेवा या वस्तु के उत्पादन में जिन कारकों की आवश्यकता होती है उन्हें उत्पादन के कारक (factors of production) कहते हैं। उत्पादन के 5 प्रमुख कारक निम्नलिखित है:

  1. भूमि (Land)
  2. श्रम (Labour)
  3. पूंजी (Capital)
  4. संगठन (Organization)
  5. उद्यम (Enterprise)

भूमि (Land) 

यह एक प्राकृतिक संसाधन है, जिसका उपयोग कर विभिन्न प्रकार की फसलों का उत्पादन किया जाता है। भूमि के भौगलिक क्षेत्रफल में तो वृद्धि नहीं की जा सकती, किंतु सघन कृषि व उच्च गुणवत्ता के बीजों का उपयोग करके कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।

श्रम (Labour)

अर्थशास्त्र की परिभाषा में श्रम शब्द का अर्थ है मैनुअल श्रम (manual labor) से है, जिसके अंतर्गत मानसिक व शारारिक श्रम दोनों को शामिल किया जाता है। वह कोई भी कार्य या पेशा जिससे आय प्राप्त होती है उसे श्रम के अंतर्गत शामिल किया जाता है।  जैसे – श्रमिक, डॉक्टर, अधिवक्ता, शिक्षक, अभिनेता, खिलाड़ी आदि।

वह कोई भी मानसिक व शारारिक कार्य जिसका उद्देश्य आय प्राप्त करना हो उसे श्रम कहा जाता है। लेकिन वह कार्य जो अपनी खुशी या आनंद के लिए किया जाता है, उसे श्रम नहीं कहा जाता है। जैसे – स्वयं के बगीचे में कार्य करना (इससे आपको कोई आय प्राप्त नहीं होगी)

पूंजी (Capital)

  1. यह एक सक्रिय उत्पादन कारक नहीं है। सभी पूंजियाँ अनिवार्य रूप में धन हो सकती है, किन्तु सभी धन पूंजी हो यह आवश्यक नहीं।
  2. पूंजी एक प्रमुख उत्पादन कारक है, जिससे आय उत्पन्न होती है।

पूंजी के प्रकार 

  • स्थिर पूंजी – भूमि, बिल्डिंग आदि।
  • कार्यशील पूंजी – मजदूरी, उर्वरक आदि।
  • डूबती पूंजी – मशीनों का खरीदना।

संगठन या उद्यम

इसका मुख्य कार्य अन्य कंपनियों व संगठनों के साथ मधुर सम्बन्ध बनाये रखना है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:

  1. संगठित करना
  2. जोखिम उठाना
  3. परिवर्तन करना

संगठन के रूप 

  1. व्यक्तिगत उत्पादक
  2. प्रतिभागिता
  3. राज्य व्यवसाय
  4. सहकारी व्यवसाय
  5. संयुक्त व्यवसाय

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